मानव तस्करी का खुला खेल,जवाहर नगर थाना है किस दबाव में,या कोई मिली भगत,आला अफसर कब लेंगें सुध,तफ्तीश जारी

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*क्या जवाहर नगर थाने के थाना प्रभारी महोदय (SHO)द्वारा महिला मानव तस्करी और दस महीने बंधक बनाने के मामले में अपराधियों के प्रभाव में आचुके है? तो फिर कैसे मिलेगा दलित महिला को न्याय !

जयपुर 24 फरवरी2019।(निक क्राइम) उड़ीसा की एक आदिवासी महिला का मानव तस्करी और बंधक बनाने के मामले में एक बहुत ही सनसनी खेज मामला सामने आया है महिला के बयानों के अनुसार उड़ीसा की एक आदिवासी महिला सुमित्रा जो बेहद गरीब और तीन छोटे 2 बच्चों की माँ है पति दुर्घटना में रीढ़ की हड्डी में चोट से अपाहिज है ऐसे में सुमित्रा का पड़ोसी सूरज नाम का एक व्यक्ति उसको काम का बहाना बनाकर अपने साथ दिल्ली ले आया और चार दिन दिल्ली में रखने के बाद पुलन्दर नाम के एक एजेंट को बेच दिया तब पुलन्दर सुमित्रा को 350 रूपये रोज में काम दिलाने का कह कर जयपुर के जवाहर नगर निवासी एक परिवार को बेचकर रुपये लेकर चला गया उसके बाद उस परिवार ने सुमित्रा को बंधक बनाकर घर मे रख लिया उसको नाम मात्र का खाना दिया जाता था, भरी सर्दियों में नाम मात्र के ओढ़ने बिछाने के कपड़े देकर फर्श पर सुलाया जाता था, घर की मालकिन और उनकी दो लड़कियां रात्री को एक -डेढ़ बजे तक मालिश करवाती थी सुबह फिर उसे जल्दी उठाकर काम मे लगा दिया जाता था और इसके अलावा रोज उसके साथ मार पीट की जाती थी मना करने पर उसके जबरदस्ती कपड़े उतार कर शरीर पर मालकिन और उसकी दो बेटियां पानी डाल कर प्रताड़ित और शारीरिक यातना दी जाती थी ऐसे में पड़ोसियों ने इसका कई बार विरोध भी किया लेकिन मालकिन सबसे लड़ने को तैयार रहती थी। जिस बेग में सुमित्रा घर से अपने कपड़े लाई थी उस बैग को भी फाड़ कर फेंक दिया और गॉव के एक पड़ोसी के फोन नंबर थे उस को भी फाड़ कर फेंक दिया गया।
आखिर जुल्म की सारी हदें पार हो गयी 22 फरवरी की रात्री को 10-11 बजे मालकिन द्वारा सुमित्रा को घर के बाहर निकाल दिया बहुत रोने गिड़गिड़ाने पर एक पड़ोसी ने 100 नंबर पर पुलिस को फोन कर दिया तो पीसीआर आगयी जो बिना महिला पुलिस कर्मी के थी पीसीआर वाले सुमित्रा को पागल खाने के बाहर पटक कर इति श्री कर के लौट गए जब इस घटना की जानकारी रात को 10 -11 बजे ss news चेनल के पत्रकार रमेश भगत को मालूम चली तो पीसीआर में तैनात पुलिस कर्मी देवनारायण से रमेश भगत ने बात की और सुमित्रा को अपराजिता महिला केंन्द्र पहुचाने का निवेदन किया तो बहुत कहने और बार 2 फोन करने पर तीन घंटे बाद पुलिस कर्मी सुमित्रा को रात्री 1-15 बजे महिला को अपराजिता सेंटर पहुंचा कर चले गये ।
अब सवाल ये उठ रहा है कि सुमित्रा तीन घंटे तक पागलखाने के बाहर सर्दी मे अकेली सड़क पर बैठी रही इस बीच अगर सुमित्रा के साथ कोई अप्रिय या अनहोनी वारदात होजाती तो इसके जिम्मेदार कौन होता ?
दूसरी बात पीसीआर में कोई महिला पुलिस कर्मी भी नही थी जब की कानूनन रात को सात बजे बाद किसी भी अकेली महिला को थाने में नही बुलाया जा सकता ।
इस सभी घटना की जानकारी रमेश भगत ने अगले दिन जार कार्यालय (जर्नलिस्ट एसोसिएशन ऑफ राजस्थान) को दी तो जार के पत्रकारों की एक टीम अपराजिता के संगठन के साथ SHO साहब से मिले और रात्री की घटना के बारे में रोष जताया तो SHO साहब बड़ी बेहयाई से बोले की मै उन पुलिस कर्मिओं को डांट दूंगा लेकिन रीपोर्ट लिखने से मना कर दिया । इसपर पुलिस के उच्च अधिकारियों के संपर्क करने पर fir शाम को 6घण्टे तक जद्दोजहद के बाद शाम 7 बजे दर्ज की गई हद तो तब होगयी तब इतने गंभीर मुकदमे में 323,341,342 की मामूली धारा लगा कर मुकदमे की गम्भीरता को ही खत्म कर दिया गया। जबकी यह अपराध मानव तस्करी और महिला को बंधक बनाने, ह्यूमन हरेशमेंट, दलित महिला उत्पीड़न का गम्भीर मामला बनता है। फिर इस मुकदमे को इतनी साधारण धारा लगा कर SHO महोदय द्वारा क्यों रफा दफा किया जारहा है? जैसा की हमेशा होता आया है …
पुलिस प्रभावशाली लोगों के प्रभाव में आ चुकी है या ?
अपराधियों से हाथ मिला चुकी है ?
अगर ऐसा है तो पीड़िता को न्याय कैसे मिलेगा ? कोन देगा न्याय ?
कौन पोंछेगा इस अबला के आँसू और कब तक ऐसा सभ्य समाज में होता रहेगा ? लोकतंत्र मे पुलिस कब अपना कर्तव्य समझ कर ईमानदार और निष्ठावान बनेगी ?? क्या *”आमजन में विश्वास और अपराधियों में भय “* के इस जुमले से कानून व्यवस्था कायम करना चाहती है ?